क्या ये न्याय है जिसका है वो उसको नहीं...
जिसको चाहा उसको दे दिया...
दुनिया देखी ना कभी उस दौर की...
न्यायमूर्ति बन बस फैसला दिया...
सुबूत देखे गवाह की सुन कर...
बस मनमर्जी का पाखंड रचा...
अपनी जान बचाने को जो बोला गया...
वो दोहराया वही आखिर तक लिखा गया...
ना खुद की आत्मा की आवाज़...
ना स्वयं विवेक ना स्वयं दृष्टि...
बस आँखों पे बांध के क़ानूनी पट्टी....
घृतराष्ट्र की तरह बैठ सिंहासन पर...
चिर निंद्रा के आसन पर...
ना धर्म दिखा ना अधर्मी...
ना सच की कही कोई खोज थी....
झूठ का दरबार सजा कर...
आँखों को बंद कर के सो गया...
न्याय की उम्मीद में अन्याय हो गया...
किसको बोले कलयुग की कहानी....
सच में सामने आ रही है...
जीते जी मृत्यु की सैय्या...
लगी हुई सामने नज़र आ रही है...
किस से उम्मीद करें जीत कर भी हारना है...
कलयुग में अन्याय से दूर थोड़ी भागना है...
न्याय गलियों में किस्से कहानियों में सुनाया जा रहा है...
अन्याय सच के तराजू में तोल के बेचा जा रहा है...
न्यायालय में न्याय का ही नामो निशान नहीं रहा है...
जो समाज में कभी नहीं बैठा है वही समाज का फैसला कर रहा है..
No comments:
Post a Comment