जो विद्या के कभी स्त्रोत थे..
गूंजते जिनके श्लोक थे...
गीता वेद पुराण ज्ञान भंडार जहाँ सुशोभित था..
कालचक्र प्रकृति विज्ञान प्रकाश जहाँ अलौकिक था...
जीवन मृत्यु का रहस्य जहाँ सुलझाया जाता था...
इंसान को भगवान से जहाँ मिलवाया जाता था...
शिक्षक जहाँ मात पिता और श्रीहरि से श्रेष्ठ होते थे...
जहाँ लगन परिश्रम त्याग गुण वाले मनुष्य तैयार होते थे...
कहाँ खो गए वो गुरुकुल आश्रम जो सच मे विद्यालय होते थे..
जहाँ सरस्वती विद्यमान हो कर सबको ज्ञान देती थी....
सबके जीवन मे ज्ञान प्रकाश भर जीने का ध्येय देती थी...
अब भोग विलास मे लिप्त इंसान किन गुणों कि बात करता है..
आज के इस संसार मे अध्यापक कहाँ तैयार किया जाता है...
इसलिए ही तो अध्यापक बन व्यापारी सिर्फ व्यापार सिखाता है...
पढ़ना भी आता है और पढ़ाना भी आता है..
गुणों को ना समझना और ना समझाना आता है...
ना संस्कारो कि अब कही पर बात होती है......
ना सिखना आता है और ना सिखाना आता है...
क्या दे कर जायेगा ये समझ ना आता है...
खुद का ध्येय ही जो ना जान पाता है...
मजबूर इंसान मज़बूरी कि दूकान चलाता है...
मजबूर अपने देश के भविष्य को बनाता है...
देखते ही देखते सब कुछ बदल जाता है...
शिक्षा और साक्षरता का फर्क ना जान पाता है...
ना धर्म और कर्मो पर कोई ध्यान दिया जाता है...
अध्यापक बनके व्यापारी सिर्फ व्यापार सिखाता है...
क्या शब्दों को पढ़ना सिखने से ज्ञान आता है....
क्या सही गलत कि समझ भी अब बनाई जाती है...
क्या किसी किस्से कहानी मे अच्छाई सुनाई जाती है...
हर तरफ अंग्रेजो के गुलाम नज़र आते है...
जिनकी शिक्षा बड़े चाव से अपनाई जाती है...
क्या कोई विद्यालय अब विद्या धन अर्जन पर बल देता है...
धन कैसे बढ़ाए बस इसके तरीके बनाता रहता है...
ना गुणों और अवगुणो का अंतर बतलाया जाता है...
देश प्रेम न्याय समाज धर्म अधर्म का ज्ञान सब सपना लगता है...
बस पैसा ही सर्वोपरि है और पैसा ही अपना है...
ये राग दिन रात हर जगह गा गा कर रटवाया जाता है..
अध्यापक बन के व्यापारी सिर्फ व्यापार सिखाता है...
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